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    IRCTC टिकट Scam जारी, फिर जनता का 100 करोड़ क्यों लगाया, वजह कुछ और तो नहीं

    IRCTC टिकट Scam जारी, फिर जनता का 100 करोड़ क्यों लगाया, वजह कुछ और तो नहीं

    आज लगभग हर किसी का रेल से वास्ता है. कोई महीना में एक बार तो कोई साल में एक बार रेल का सफर जरूर करता है. ऐसे में जब कन्फर्म टिकट मिल जाये तो समझता है कि भगवान मिल गया. आज से दो दिन ही पहले एक महिला पत्रकार का फोन आया कि उनके किसी सम्बन्धी को रेल टिकट की जरुरत आन पड़ी है. किसी एजेंट का नंबर है तो दीजिये. हमने कहा की सॉरी मैडम एजेंट से कभी टिकट लिया नहीं इसलिए इसकी जानकारी नहीं है. एक बात स्पष्ट है कि हम 2G से 3G और 4G से 5G होने जा रहें है. मोदी जी डिजिटल इंडिया की बात करते हैं. हम दाऊद को पकडने की बात करते है. मिडिया भारत की तुलना अमेरिका से करने से कभी पीछे नहीं रहता. नोटबंदी से लेकर जीएसटी सबकुछ कर देख लिया मगर करप्शन है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा. उसमे भी अगर रेल टिकट स्कैम गूगल में सर्च करें तो लिस्ट लम्बी है. शायद पढ़ते-पढ़ते उम्र बीत जाये.
     

    आये दिन कि तरह कल भी सीबीआई ने रेलवे के तत्काल टिकट बुकिंग का अवैध सॉफ्टवेयर से टिकट बुक कर जनता को चुना लगाने वाले एक बड़े गिरोह पर्दाफाश किया है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस गिरोह का मुखिया या मास्टरमाइंड कहिये उनका खुद का ही एक असिस्टेंट प्रोग्रामर निकला. बात बहुत ही आश्चर्ज करने वाली है. मगर इसके बाद जानकारी के अनुसार उनके निशानदेही पर देश भर में कुल 14 स्थानों पर छापेमारी की गई है. सीबीआई ने प्रेस रिलीज कर जानकारी दी उक्त छापेमारी में 89.42 लाख (लगभग); स्वर्ण आभूषण रुपये की कीमत 61.29 लाख (लगभग) प्रत्येक 1 किलो के दो स्वर्ण बार; 15 लैपटॉप; 15 हार्ड डिस्क; 52 मोबाइल फोन; 24 सिम; 10 नोटबुक; 06 राउटर; 04 डोंगल; 1 9 पेन ड्राइव और अन्य आरोपी सामग्री आरोपी के परिसर से और अन्य बरामद किया गया है.
     

    जानकारी के अनुसार गिरफ्तार सहायक प्रोग्रामर का नाम अजय गर्ग तथा उसके साथी का नाम अनिल गुप्ता है. अजय गर्ग दिल्ली तथा साथी मुंबई का निवासी है. इनके अलावा एफआईआर में 13 लोगों को और नामजद किया गया है. सभी आरोपियों के खिलाफ आईटी एक्ट, रेलवे एक्ट सहित भ्रष्टाचार की धारा के तहत मामला दर्ज किया गया है. अन्य आरोपियों की तलाश में सीबीआई की विभिन्न टीमें छापेमारी कर रही हैं.

    सीबीआई में सहायक प्रोग्रामर के पद पर कार्यरत श्री अजय गर्ग इस अवैध बुकिंग का मास्टर माइंड बताया गया है. वह पहले भारतीय रेलवे केटरिंग एंड टूरिज्जम कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईआरसीटीसी) के आईटी सेंटर, नई दिल्ली में 2007 से 2011 के बीच काम कर चुका है. आरोप है कि उसने कुछ लोगों के साथ मिल कर तत्काल टिकटों की बुकिंग के लिए एक अवैध सॉफ्टवेयर सिस्टम तैयार किया. सिस्टम तैयार करने के बाद उसने अनिल गुप्ता के माध्यम से रेलवे के उनक एजेंटों को सॉफ्टवेयर बेचना शुरू कर दिया जो रेलवे टिकट बुकिंग का धंधा करते हैं. अनिल गुप्ता के माध्यम से और भी लोग इस धंधे में शामिल हो गए और उन्होंने देश भर के कई हिस्सों में बेचा और मोटी रकम कमाई. बताया गया कि अवैध सॉफ्टवेयर रेलवे और आईआरसीटीसी के नियमों के मुताबिक गैरकानूनी है. गिरफ्तार दोनों आरोपियों से पूछताछ के दौरान यह भी खुलासा हुआ है कि रेलवे एजेंटों से उन्होंने बिटक्वाइन और हवाला के माध्यम से भी रकम ली है. बताया गया कि इस साफ्टवेयर के माध्यम से एक बार में सैंकड़ों टिकट बुक किये जा सकते हैं.

    किसी-किसी अख़बार ने यह भी लिखा है कि अजय गर्ग चुकी आईआरसीटीसी में काम कर चूका है इसलिए उसको आईआरसीटीसी के बेवसाइट का लूपहोल्स पता था. मगर उनको यह नहीं पता कि आईआरसीटीसी ने 2014 में नया Shoftware भी नया कम्पनी क्रिस से बनवाया है. हाँ मगर आईआरसीटीसी के आईटी सेंटर में काम करने वाले अधिकारी वही हैं. ऐसे भी रेलवे के सर्कुलर के हिसाब से सेंसटिव पोस्ट पर कोई भी अधिकारी और कर्मचारी 2-3 वर्ष से ज्यादा नहीं रह सकता. मगर हमें नहीं लगता की आईआरसीटीसी कोई कानून को मानता है. कोई-कोई अधिकारी तो पिछले 10 साल से एक ही मलाईदार पद पर जमे हैं. कुछ ने तो अपनी ऊंची पहुंच के माध्यम से मात्र 3-4 वर्षों में फिस्ट ट्रैक परमोशन के नाम पर उच्च पद पर भी आसीन हो गए हैं.
     

    अब थोड़ा इसके आगे बात करते हैं. अभी हाल ही में आईआरसीटीसी ने 100 करोड़ रुपया खर्च कर आईआरसीटीसी का नया बेवसाइट यानि न्यू जेनरेशन का नाम से बेवसाइट क्रिस से बनवाया है. बिजनेश स्टैंडर्ड की खबर की माने तो इसमें पैसे लगाने से पहले प्रबंधन ने दाबा किया था कि नई वेबसाइट में सुरक्षा और धोखाधड़ी का पता लगाने में वृद्धि होगी और कनेक्टिविटी मुद्दों के कारण कोई भी अपूर्ण लेनदेन फिर से शुरू कर सकता है. अब जरा आप बताइये कि इतना पैसा खर्च करने के बाद भी आम जनता को टिकट मिल पाती है? आज क्रिस द्वारा डेवलप किये नए बेवसाइट कोई लंच हुए 3 साल होने जा रहे है. इस दौरान टिकट फ्रॉड रुकने का तो छोड़ दीजिये और बढ़ा ही है.

    अगर 100 करोड़ का न्यू जेनरेशन आईआरसीटीसी का बेवसाइट आम आदमी और ऑटोमैटिक Software  के रिक्वेस्ट को पहचान नहीं कर पा रहा तो बेकार में ही पैसा पानी में बहा दिया. यह भी एक बड़ी बात है कि जहां एक तरफ आम यात्री तत्काल के समय 1 आईपी से 2 टिकट से ज्यादा टिकट बुक नहीं कर पाता जबकि shoftware bulk में बुक कर लेता है. इसका दो ही कारण हो सकता है, या तो जानबूझकर ऐसे लोगों को छूट दिया गया है या फिर जानकारी का अभाव है. जो इतना बड़ा Software  बना सकता उसको जानकारी का अभाव होना कहना ज्यादती होगी. आखिर पिस्ता तो आम आदमी ही है.
     

    वही बिजनेश टुडे के खबर के अनुसार रेलमंत्री श्री पियूस गोले ने साइबर सिक्योरिटी बढ़ने का आर्डर दिया है. अब जाहिर सी बात है 100 करोड़ के बाद फिर से खर्चा. अरे साहब पहले 100 करोड़ में जो सिक्योरिटी का दाबा किया था वह क्या हुआ? कम-से-कम पूछ तो लिया होता. आखिर जनता का पैसा खर्च करने से पहले कुछ तो सोचिये. आखिर यूहीं कब तक हम टिकट के लिए एजेंटों के चक्कर लगायेंगे.

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