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    कठुआ गैंगरेप- वो मासुम कल भी सहमी थी और आज भी सहमी है, ये बलात्कारी किसकी देन?

     कठुआ गैंगरेप- वो मासुम कल भी सहमी थी और आज भी सहमी है, ये बलात्कारी किसकी देन?

    निर्भया गैंग रेप के बाद कठुआ गैंगरेप ने एक बार फिर से पुरे देश को हिलाकर रख दिया है. बड़े ही शर्म के साथ कहना पड़ रहा है कि यह वह मामला है, जिसमें मात्र 8 साल के बच्ची के साथ 8 लोग बहुत ही बेरहमी से बलात्कार कर मौत के घात उतार देते हैं. इसके घटना के बारे में पटना की दैनिक भाष्कर की पत्रकार नेहा निहारिका ने अपना दर्द बयान किया है. अब आप सोच रहे होंगे कि ऐसा क्या लिखा. उन्होंने जो भी लिखा है, शायद थोड़ा आपको बुरा लगे, मगर सच हमेशा बुरा ही होता है.
     

    दूसरी आसीफा के इंतज़ार में...

    नेहा ने लिखा है कि कल पटना में लोग कैंडल मार्च कर रहे थे. मुझे भी बुलाया था, लेकिन गई नहीं. क्यो जाऊं. पता हैं, वहां भी कुछ लोग ऐसे होंगे जो केवल देखेंगे कि मैं किसके साथ आयी, किसके साथ थी, किसके साथ गई. क्या पहना था मैंने और चाहे जो पहना हो, कुछ की नज़र मेरे कपड़ो को फाड़ती हुई अंदर झांकने की कोशिश करेगी. वहां से निकल लोग McDonald's में बर्गर खायेंगे और सरकार को गालियां देकर घर आ जायेंगे. दूसरी आसीफा के इंतज़ार में...

    और दे भी क्यों न, सरकार को हर बात में गाली देने का फैशन जो है, पर आसीफा का बलात्कार करने वाले ये नेता, ये पुजारी, पुलिस वाले किस समाज की देन हैं. ये इसपर कोई बात करेगा?

    अबे नामर्द थोड़ी न हैं.

    पैसे के लिए, हवस के लिए, अय्याशी के लिए रोज न जाने कितने झूठ बोलते हैं. राह चलती लड़कियों को ताकते हैं. जो लड़का ऐसा न करे उसे गे कहते हैं. अरे क्रांतिकारी बने फिरते हैं, और सच में औरतों के पीठ पीछे अनाप शनाप बातें करते हैं फिर कहते हैं, अबे नामर्द थोड़ी न हैं.

    सब स्वार्थी हैं और जब स्वार्थ आपके अंदर हो तो आप बदलाव नहीं ला सकते. उन बलात्कारियों को क्या दोष देना. वो कम पढ़ लिखे हैं तो बलात्कार करते हैं, आप पढ़े लिखे हैं लेकिन तब भी आंखों से बलात्कार करते हैं. अगर आप पढ़े लिखे नहीं होते तो आप भी यही करते.

    उन्होंने समाज की सच्ची उजागड़ करते हुए लिखा कि हम ऑफिस के रिसेप्शन पर तो लड़कियों को मोम की पुतली बनाकर बैठाते हैं कि ग्राहकों को अटेंड करो. एक वस्तु की तरह, ग्राहक सेवा केंद्रों (Customer Care), आजकल सेल्स वुमेन के रूप में, बड़े-बड़े शोरूम, मॉल, रेस्टोरेंट, कॉफी सेंटर में लड़कियों को सर्विस प्रोवाइडर बनाके, जैसे परोसने का काम करते हैं फिर कहते हैं कि महिलाओं का सम्मान करो.

    महिलाएं भी महिलाओं के ही खिलाफ खूब योगदान दे रही

    और ऐसे समाज में यहां मै खुद को स्वतंत्र मानकर इठलाती रहती हूं. जबकि मुझे भी पता है कि कैसे रोज़ लोगों की नज़रो से खुद को बचाती हूं. सोचती हूं, सब अपने काम में लगे हैं, लेकिन नहीं, लोग आपको देख रहें होते हैं. उनकी बेशर्म निगाहें आपके आपके कपड़े फाड़ रही होती हैं और पता भी नहीं चलता और इसमें सिर्फ पुरुषों को दोष मत दो. इस गंध में महिलाएं भी महिलाओं के ही खिलाफ खूब योगदान दे रही हैं.

    उन्होंने आगे लिखा है कि खैर, आपको बहुत बुरा लग रहा होगा. बेचारी लग रही होगी वो बच्ची. ज़रा सोचिये, ऐसी कितनी आसीफा आपके आस-पास हैं. उन्हें भी थोड़ा सम्मान दे दिजीये. हर साल इस कैंडल मार्च के जुमले की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

    एक आंकड़े के अनुसार हर दिन करीब 107 महिलाओ का बलात्कार होता है. जिनमें से 46 लड़कियां 18 साल से कम उम्र की होती है और ये तो वो पहलू हैं जो दिख जाते हैं. ऐसे न जाने कितनें दर्द होंगे जो हलक से निकल तक न पाते होंगे.

    अरे घंटा फर्क पड़ेगा मुझे 

    पता है क्यों? क्योंकि लड़कियों को ये डर हमेशा होता है कि हो सकता है उंगली उस पर हीं न उठ जाये. किससे कहे? आप सुनेंगे? नहीं. कहेंगे ध्यान मत दो, रास्ता बदल लो, कपड़े सही पहनो और फिर.. जब कोई लड़ते-लड़ते दम तोड़ देगी, तो जाके मोमबत्तियां जलायेंगे. अरे घंटा फर्क पड़ेगा मुझे तुम्हारे मोमबत्ती जला लेने से?

    इस तरह की घटना से नेहा ही नहीं बल्कि देश का हर इंसान दुःखी है. यहां इंसान लिखने का तत्पर्ज है कि वह व्यक्ति जो मानवता के परिभाषा पर खड़ा उतरे. मेरी मानिये तो भगवान और शैतान हम सभी के अंदर ही मौजूद होता है. यह बड़ी बात है कि हम खुद पर किसको हावी होंगे दें. नेहा जी ने बिलकुल ही सही लिखा है कि क्या केवल एक आसिफा को न्याय देने से या न्याय दिलाने से इस तरह की घटनाएं बंद हो जाएगी? 

    कहीं न कहीं सरकार भी काम दोषी नहीं है

    हां, एक बात नेहा जी से जरूर कहना चाहूंगा कि जरुरी नहीं की सभी मर्द एक समान हों. जिस तरह महिला में हमारी मां, बहन, पत्नी, बेटी, दोस्त आदि शामिल होती है ठीक उसी तरह मर्द में हमारे पिता, भाई, पति, बेटा, दोस्त आदि भी हैं. हां, जहां समाज का एक तबका गलत होने पर खड़े-खड़े तमाशा देख रहा होता. वही दूसरी तरफ एक तबका कैंडिल जलाकर अपना विरोध तो जाहिर किया. आपने लिखा है कि हम केवल सरकार को गलियां देते हैं. इस घटना के पीछे हम समाज के लोगों के आलावा कहीं न कहीं सरकार भी कम दोषी नहीं है. 

    यह कोई देश के लिए नई घटनाएं नहीं है और ऐसा भी नहीं की इसको रोकने के लिए हमारे देश में मजबूत कानून नहीं है. हां, कानून हैं तभी तो आसाराम और राम रहीम जैसे प्रभावशाली अपराधी लोग जेल में बंद है. यह बात और है कि देश में न्याय देने वाले जज की कमी है. एक तरह से कहे तो इसको पालन करने वाले System का हाथ सरकार ने बांध रखा है. जिसके कारण केस की सुनवाई बैलगाड़ी से भी धीरे होती है. न्याय मिलते-मिलते या तो आरोपी मर जाता, शिकायतकर्ता मार दिया जाता, हां कभी-कभी गवाह और शिकायतकर्ता भी घटना को भूल जाता. जिसके कारण गवाही सही से नहीं हो पाता और जिसका फ़ायदा सीधे आरोपी को मिलता है. अब ऐसे में सवाल है कि कैसे मिले, निर्भया और आसिफा और न जाने हजारों देश की बेटियों को न्याय. जिसके बारे में हम जान भी नहीं पाते?

    हम महिलाओं के प्रति सोच नहीं बदलते तब तक

    आपकी बातों से पूर्ण सहमत हूं कि सच में, जब तक हम महिलाओं के प्रति सोच नहीं बदलते तब तक केवल एक दिन कैंडिल जलाने से क्या होगा? मैं खुद देश की राजधानी दिल्ली में रहता हूं. आसपास के लोगों के सोच से हैरान हूं. सोशल मिडिया में इस शर्मनाक घटना की पैरवी करते हुए, कुछ लोग कह रहे कि क्या इस तरह की घटना क्या कांग्रेस के समय में नहीं होती थी? तो गुस्सा आता है. आज जो लोग भी समर्थन कर रहें, कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में वो बीमार हैं. उनको डॉक्टर की जरुरत हैं. मैं उनकी लड़कियों और महिलाओं के बारे में गिरी हुई सोच पर ताज्जुब करता हूं. वही दूसरी तरफ बहुत से अच्छे लोगों को भी जानता हूं. 

    हमारी अनदेखी ही उनकी हिम्मत है. यह बात भी सौ फीसदी सही है कि आज अगर दूसरों के साथ गलत होता देख चुप रहें तो वह दिन दूर नहीं जब दूसरा नंबर हमारी बेटी का होगा. हम सभी को सोच बदलने की जरूरत है. क्या आप नहीं चाहते कि रेप नामक बीमारी का जड़ से ईलाज हो? 

    2 comments:

    1. Ese Janwaro ko chorahe par aag laga deni chahiye

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      Replies
      1. यह भी देखना होगा कि ऐसे जानवर आखिर हमारा समाज ही पैदा करता है

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