देश में युद्ध जैसे हालत, Defence Employees निजीकरण के खिलाफ धरना पर

देश के सीमा पर तैनात सेना के जवान के बदौलत ही लोग चैन की नींद सो पाते है. बिना गोला बारूद के सैनिक शायद ही ऐसा कर पाने में सक्षम होंगे. सरहदों की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात सेना के जवानों की जितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, उतनी ही उल्लेखनीय भूमिका सेना के आयुध फैक्ट्रियों में बनने वाले साजो-सामान और उसे बनाने वाले कर्मचारियों की होती है. भारतीय सेना के लिए हथियाऱ, वाहन, ट्रक, गोला-बारूद और जूते-कपड़े का निर्माण करने वाले रक्षा प्रतिष्ठान के सिविलियन कर्मचारी (Defence Employees) आंदोलन की राह पर हैं.

Defence Employees निजीकरण के खिलाफ धरना पर

आल इंडिया डिफेंस इंप्लाईज फेडरेशन के महासचिव सी श्रीकुमार कहते हैं कि देश भर में  स्थित 41 आयुध फैक्ट्रियों में 88000 कर्मचारी सेना से संबंधित लगभग 200 प्रोडक्ट बनाते हैं. जिसमें लड़ाई के सामान से लेकर सेना के जवानों के लिए वर्दियों से लेकर जूता तक शामिल है. एनडीए सरकार ने करीब 152 समानों को निजी कंपनियों से लेने का फैसला किया है. जिससे लगभग एक लाख कर्मचारियों का भविष्य दांव पर लग गया है.’

पुणे स्थित आयुध फैक्ट्री में काम करने वाले मोहन होला कहते हैं कि “यह सरकार सेना और सीमा की सबसे ज्यादा बात करती है. सैनिकों और रक्षा प्रतिष्ठान के कर्मचारियों को हर सुख सुविधा मुहैया कराने की बात करती है. लेकिन रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश, निजीकरण और आउटसोर्सिंग का एजेंडा लेकर आई है.”

रवीन्द्र रेड्डी कहते हैं कि “जब देश के रक्षा मंत्रालय की फैक्ट्रियों में बनने वाले समानों को लेना बंद कर निजी कंपनियों से सामन लिया जायेगा तो धीरे-धीरे एक-एक कर आयुध कारखानों को बंद कर दिया जाएगा. इससे लाखों कर्मचारियों का परिवार भुखमरी का शिकार होगा. सरकार की मंशा ठीक नहीं है. इसलिए हम लोग भूख हड़ताल पर बैठे हैं.”

जनचौक के खबर के अनुसार आल इंडिया डिफेंस इंप्लाईज फेडरेशन के उपाध्यक्ष हरभजन सिंह संधू कहते हैं कि “सरकार लंबे समय से कर्मचारियों का भत्ता, न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं की है. इसके साथ ही पेंशन योजना को बंद कर दिया है. हम चाहते हैं कि आयुध फैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ाने के साथ ही कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की जाए.”

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