मोदी सरकार के मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संसद मार्ग पर महापड़ाव

नई दिल्ली: मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी बदलाव व अपने अन्य 12 सूत्री मांगों के लिए संसद मार्ग पर महापड़ाव पर बैठे लगभग एक लाख मजदूरों का राष्ट्रीय महापड़ाव सफलता पूर्वक समाप्त हुआ. ऐसा कतई न समझे की यह लड़ाई का अंत है, बल्कि यह तो लड़ाई की शुरुआत हुई है. आपको जानकारी के लिए बता दें कि मोदी सरकार ने अच्छे दिन का सपना दिखा कर आमजन और मजदूरों से वोट लेकर गद्दी संभाली है. मगर यह क्या अच्छे दिन का वादा किससे किया और किसके अच्छे दिन आ गये किसके?

मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ संसद मार्ग पर महापड़ाव

आज 11 नवम्बर 2017 संसद मार्ग पर महापड़ाव की समाप्ति के साथ ही जनवरी 2018 के महीने के अंत में पुरे देश में इसी अभियान के तहत जेल भरो अभियान उसके बाद 1 दिन का राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा की गई. अगर इसके बाद भी मोदी सरकार नहीं मानी तो मज़बूरी में पूरा देश के मजदूरों को एक साथ अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने से कोई नहीं रोक सकता है. इस फैसले को सर्वसम्मति से हाथ उठकर पास किया और साथ ही सरकार के लाठी गोली से नहीं डरने की कसम भी खाई.
देश के सभी बड़े सेंट्रल ट्रेड यूनियन के आह्वान पर देश के कोने-कोने से लाखो मजदुर दिल्ली के संसद मार्ग पर पिछले तीन दिन से जमे थें. बिलकुल शांतिपूर्ण ढंग से धरना पर बैठे रहे. इस दौरान पुलिस भी आराम फरमाती नजर आयी. मजदूर संगठनों का आरोप है कि  केंद्र सरकार की जन-विरोधी और मजदूर-विरोधी नीतियाँ जनता के हर हिस्से में करोड़ों आम लोगों पर भयावह दुःख और कठिनाइयाँ बरपा कर रही हैं. कारखानों की बन्दी, बढ़ती बेरोजगारी और आजीविका की हानि में वृद्धि, आज आम हो गयी है.
सरकार की नोटबन्दी ने आमदनी को और अधिक कम किया और उद्योगों को बंद कर दिया. वेतनों में कटौती और सामाजिक सुरक्षा का नकार, श्रमशक्ति का बड़े पैमाने पर ठेकाकरण तेजी से बढ़ रहे हैं. सरकार द्वारा प्रायोजित योजना कर्मचारियों को, मजदूरों के तौर पर मान्यता और अधिकारों से वंचित किया जा रहा है. खेती में गहराते संकट ने किसानों की आत्महत्या और भुखमरी से मौतों में बढ़ोत्तरी ने स्थिति को और अधिक बिगाड़ दिया़ है. उतावलेपन के साथ जीएसटी लागू करने से लगातार बढ़ती कीमतों में और तेजी आई है.
इन सभी प्रतिगामी उपायों को, ‘‘सबका विकास’’, ‘‘अच्छे दिन’’, ‘‘मेक इन इंडिया’’ आदि भ्रामक और धोखेबाजी भरी मुद्राओं एवं नारों और राष्ट्रवादी भावनाओं की आड़ में, भारी शोर-शराबे पूर्ण मीडिया अभियान की मदद से जनता को बेवकूफ बनाकर लागू किया गया है. सरकार की नीतियाँ देश की अर्थव्यवस्था के आत्मनिर्भर, समानतापूर्ण विकास को खतरे में डाल रही हैं और समाज में भयानक असमानता को बढ़ावा दे रही हैं. सरकार की पूरी नीति की बनावट ही देशी-विदेशी निजी बड़ी कंपनियों के असीमित लाभ के लिए और ‘‘व्यापार करने में आसानी’’ की आड़ में बड़े जमींदारों के लाभ लिए ही है.
देश में विभिन्न सम्बद्धताओं के सभी ट्रेड यूनियनों द्वारा विरोध के बावजूद भी, सरकार अपने मालिकान-समर्थक और पूरी तरह से मजदूर-विरोधी श्रम-कानून सुधारों पर आगे बढ़ रही है, जिसका उद्देश्य मजदूरों पर गुलामी थोपना है. इन घातक हमलों का तात्कालिक प्रतिकूल असर देश के कर्मचारियों की भारी संख्या पर है, यहाँ तक कि संगठित क्षेत्र को भी सभी बुनियादी श्रम कानूनों को लागू करने की बाध्यता से बाहर कर दिया जाएगा. इस प्रकार मजदूरों के शोषण को और अधिक तेज करने के लिए मालिकों को सशक्त बना दिया जाएगा.

संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी के अधिकार पर हमला दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है. वर्तमान सरकार द्वारा सभी त्रिपक्षीय, द्विपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से देश के सबसे बड़े केंद्रीय ट्रेड़ यूनियन इन्टक को अचानक दुराग्रहपूर्ण ढंग से हटाना, ट्रेड यूनियन अधिकारों पर गंभीर हमला है.प्त करके ‘सामाजिक सुरक्षा कोड’ तैयार करने का है.

इसमें सदस्य मजदूरों के योगदान से तैयार 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक के विशाल सामाजिक सुरक्षा फण्ड को शेयर बाजार में सट्टेबाजी के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी है और यह क्रूर कदम ‘सामाजिक सुरक्षा के सार्वभौमिकीकरण’ की सबसे भ्रामक और धोखेबाजी पूर्ण अवधारणा के तहत लिया जा रहा है. वेज बिल 2017 कोड संसद में पेश किया जा चुका है जो काम करने के बाद भी मजदूरों को वेतन भुगतान के मामले में भी मनमाने ढ़ंग के लचीलेपन के साथ मालिकान को सशक्त बनाता है.

रक्षा क्षेत्र पर हमला, पिछले 65 वर्षों के दौरान देश द्वारा विकसित विनिर्माण क्षमता और अनुसंधान की पहल को बर्बाद करना है. सबसे खराब और सबसे ज्यादा संदिग्ध गेम प्लान, लम्बे अरसे से आॅर्डीनेन्स फैक्ट्रियों द्वारा मुहैया कराए जाने वाले हथियारों और महत्वपूर्ण उपकरणों आदि के 50 प्रतिशत से अधिक उत्पादों को आउटसोर्स करना है.

रेलवे का पूरा निजीकरण करने के लिए, कदम दर कदम जोर दिया जा रहा है. रेलवे द्वारा बनाए गए मौजूदा ट्रैकों पर निजी रेलगाड़ियाँ चलाने, 407 रेलवे स्टेशनों के निजीकरण का निर्णय सरकार द्वारा लिया गया है. रेलवे के निजीकरण की इस विनाशकारी योजना को अंजाम देने के लिए रेलवे विकास प्राधिकरण का गठन किया जा चुका है. पिछले तीन सालों में रेलवे के किराए दोगुने कर दिए गए और अब पूरी तरह से लागत आधारित करने का अर्थ है, यात्री किरायों को आगे और कम से कम दुगना करना, जो आम जनता के लिए गंभीर रूप तकलीफदेह और निजी मुनाफाखोरी को लाभ पहुँचाने वाला ही होगा.
लगातार बढ़ती बेरोजगारी, अपर्याप्त रोजगार और सार्वजनिक उपयोगिताओं के निजीकरण ने महिला मजदूरों  पर बोझ बढ़ा दिया है. महिलाओं के वस्तुकरण के साथ दकियानूसी विचारों के प्रचार के कारण, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा में वृद्धि हो रही है. वर्तमान सरकार के खुले संरक्षण में और सत्तारूढ़ राजनीति की साम्प्रदायिक ताकतों द्वारा विभाजनकारी अभियान, दुष्प्रप्रचार, के माध्यम से नफरत फैलाने के साथ निर्दोष लोगों की हत्याऐं की जा रही हैं.

यूनियन संगठनों ने सयुंक्त घोषणा पत्र जारी कर कहा है कि मेहनतकशों की उस एकता को तोड़ने की साजिशें की जा रही है, जो हमारे 12 सूत्रीय मांग पत्र पर चलने वाले संघर्षों को आगे बढ़ाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय अखंडता और मजदूरों की शक्तिशाली एकता की रक्षा के लिए इस तरह के राष्ट्रीय-विरोधी कृत्यों को हर कीमत पर और हर तरह से विरोध किया जाना चाहिए.

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