सेन्ट्रल गवर्नमेंट के कॉन्ट्रैक्ट वर्कर के न्यूनतम वेतन पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

अगर आप सेन्ट्रल गवर्नमेंट के अंडर किसी भी विभाग में ठेका या आउटसोर्स वर्कर के रूप में न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे हैं तो दिल्ली हाईकोर्ट ने आपके बारे में एक बेहतरीन फैसला दिया हैं. जिसके बाद शायद यह कन्फ्यूजन तो क्लियर होगा ही कि आपको सेन्ट्रल गवर्नमेंट के द्वारा नोटिफाइड न्यूनतम वेतन मिलेगा या राज्य सरकार के द्वारा जारी किया हुआ.

सेन्ट्रल गवर्नमेंट के ठेका वर्करों के न्यूनतम वेतन

नई दिल्ली स्थिति एमटीएनएल में ठेकेदार (आउटसोर्स एजेंसी) के द्वारा काम करने वाले कुछ ठेका/आउटसोर्स वर्कर को अचानक से नौकरी से निकाल दिया जाता हैं. उसके बाद वो यूनियन की मदद से अपने नौकरी से निकालने का केस करने के साथ ही साथ न्यूनतम वेतन का केस रीजिनल लेबर कमिश्नर सेन्ट्रल के ऑफिस में लगाते हैं.

दिल्ली सरकार द्वारा जारी न्यूनतम वेतन दिया जा रहा था | Central Government Contract Workers

जिसमें वो मांग करते हैं कि वो सेंट्रल गवर्नमेंट के अंडर एमटीनल में ठेका वर्कर के रूप में ब्रॉडबैंड सर्विस के कस्टमर केयर व् टेक्निकल सपोर्ट डिपार्टमेंट में काम कर रहे थे, उनको सेंट्रल गवर्नमेंट के चीफ लेबर कमिश्नर (सेंट्रल) के द्वारा जारी नोटिफिकेशन के अनुसार न्यूनतम वेतन न देकर दिल्ली सरकार द्वारा जारी न्यूनतम वेतन दिया जा रहा था. उस समय 2017 में दिल्ली सरकार का न्यूनतम वेतन सेन्ट्रल गवर्नमेंट द्वारा जारी नोटिफिकेशन से कम था. इसलिए उन्हें कानून के अनुसार कम दिए गए भुगतान पर दस गुना हर्जाना दिया जाए.

प्रबंधन कर्मचारियों को दोगुना हर्जाना की राशि प्रदान करें

दोनों यानी प्रबंध और कर्मचारियों का पक्ष सुनने के बाद श्री तेज बहादुर, रीजिनल लेबर कमिशनर (सेंट्रल) ने आर्डर देते हुई कहा कि सेन्ट्रल गवर्नमेंट के अंतर्गत न्यूनतम वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों को सेन्ट्रल गवर्नमेंट और राज्य सरकार के द्वारा न्यूनतम वेतन के नोटिफिकेशन के अनुसार दर में से जो ज्यादा होगा वो देना होता हैं. इसलिए प्रबंधन कर्मचारियों को 10 दिन के अंदर दोगुना हर्जाना की राशि प्रदान करें. आपको जानकारी के लिए बता दूँ कि करीब 23 ठेका वर्करों ने क्लेम लगाया था. जिनके लिए आर्डर किया गया.

इस आर्डर को प्रबंधन ने नहीं माना और इसको दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी. जिसके बाद माननीय दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 नवंबर 2018 को उक्त आरएलसी (सेंट्रल) के फैसले को रद्द कर दिया. जिसके खिलाफ 10 कर्मचारियों ने डिवीजल बेंच (दो जज वाले) में चुनौती दी.
माननीय कोर्ट ने दिनांक 02 मई 2019 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला देते हुए रीजिनल लेबर कमिशर सेन्ट्रल के आर्डर को बहाल करने का आदेश जारी किया है. इसके साथ ही ठेकेदार को निर्देश दिया है कि 25 हजार रुपया केस खर्च के रूप में और हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करने वाले 10 कर्मचारियों को एक-एक हजार रुपया अतिरिक्त ठेकेदार को देने का आर्डर जारी किया हैं.
उम्मीद करता हूँ कि आपलोगों का कन्फूजन क्लियर हो गया होगा. 2017 से पहले सेंट्रल गवर्नमेंट के द्वारा जारी न्यूनतम वेतन बहुत ही कम था. जिसके कारण आपको सेंट्रल गवर्नमेंट के डिपार्टमेंट्स में ठेका वर्कर के रूप में काम करने के वावजूद (जो ज्यादा होगा) राज्य सरकार द्वारा जारी न्यूनतम वेतन दिया जाता था.
मगर 2017 के बाद सुरजीत श्यामल बनाम भारत सरकार जनहित याचिका के मांग के बाद सेन्ट्रल गवर्नमेंट के ठेका वर्करों के न्यूनतम वेतन में 40 प्रतिशत वृद्धि किया गया था. जो कि अभी फिलहाल पुरे देश एक “ए” कैटेगरी के 16 शहर में 15000+ रुपया हैं. ऐसे में आप चाहे जिस भी राज्य में सेन्ट्रल गोवनमेंट के  डिपार्टमेंट्स में ठेका वर्करों के रूप में काम करते हैं तो (सेंट्रल या राज्य सरकार) जो ज्यादा होगा वो नियमतः मिलना चाहिए.

सेन्ट्रल गवर्नमेंट के ठेका वर्करों के न्यूनतम वेतन पर दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

 

अगर अब भी आपको नहीं दिया जा रहा तो आप भी एमटीएन में काम करने वाले कर्मचारियों के तरह रीजिनल लेबर कमिश्नर (सेन्ट्रल) ऑफिस में शिकायत कर दस गुना हर्जाना की मांग कर सकते हैं.
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1 thought on “सेन्ट्रल गवर्नमेंट के कॉन्ट्रैक्ट वर्कर के न्यूनतम वेतन पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला”

  1. Out source worker ko job dene ke badd contractor KO kiya documents Dena hota hai?? (As a proof of work order) plz inform me sir…i m waiting for your reply.

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