Minimum Wages in Delhi सुप्रीम कोर्ट के आर्डर में गोलमोल तो नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के 50 लाख मजदूरों के न्यूनतम वेतन (Minimum Wages in Delhi) में ऐतिहासिक फैसला दिया. जिसके अनुसार कोर्ट ने दिल्ली सरकार द्वारा प्रस्तावित न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन जारी करने का आदेश जारी किया हैं. इसके बाद कल दिल्ली के मुख्यमंत्री ने नोटिफिकेशन के साथ देश के सबसे ज्यादा न्यूनतम वेतन बताने के साथ ही प्रेज रिलीज जारी किया. मगर इसके बाद कुछ Confusion Create हो गया हैं. आइये एक बारे हम इसपर नजर डालते हैं.

Minimum Wages in Delhi

कल इसकी खबर देश के तमाम अख़बारों और मिडिया चैनल के माध्यम से आपको मिल चुकी होगा. अमर उजाला के खबर के अनुसार दिल्ली सरकार ने दाबा किया हैं कि उनके इस फैसले से राजधानी के करीब 50 लाख लोगों को दोहरा फायदा मिलेगा. न्यूनतम मजदूरी बढ़ने के साथ यह मामला कोर्ट में लंबित रहने के दौरान का छह महीने का महंगाई भत्ता भी उन्हें मिलेगा.
इसके आलावा यह भी कहा गया कि मामला कोर्ट में लंबित होने से अप्रैल से अक्तूबर तक महंगाई भत्ता नहीं बढ़ा हैं. अब अदालत से फैसला हो जाने के बाद नियोक्ताओं को इसे देना होगा. इसके लिए सरकार अलग से अधिसूचना जारी करेगी. इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

इसके साथ ही उन्होंने गजट नोटिफिकेशन का कॉपी भी जारी किया. जो गजट नोटिफिकेशन 22 अक्टूबर 2019 को जारी किया गया हैं. हमें इस गलत नोटिफिकेशन के बारे में पूर्व के पोस्ट में विस्तार से बताया हैं. इसके साथ ही गजट नोटिफिकेशन का कॉपी भी डाउनलोड कर सकते हैं – Minimum Wages in Delhi Notification Oct 2019 कितना वृद्धि कियाअब ठीक इसके एक दिन बाद लेबर विभाग ने नोटिफिकेशन दिनांक 23.10.2019 जारी कर दिया है. जिसके बाद असली Confusion Create हुआ है. असल में सुप्रीम कोर्ट का आर्डर के बाद केजरीवाल जी का घोषणा, 22.10.2019 नोटिफिकेशन, 23.10.2019 का नोटिफिकेशन सब में अलग-अलग बात कही गई हैं. इस वजह से मजदुर परेशान कि आखिर उनको कौन सा न्यूनतम वेतन मिलेगा और क्यों?

अगर हम साफ़ शब्दों में कहें तो केजरीवाल सरकार द्वारा माननीय सुप्रीम कोर्ट के आर्डर का अवहेलना ही तो हैं. तभी तो सुप्रीम कोर्ट के आर्डर को ही बदलते हुए न्यूनतम वेतन को चालाकी से कम कर दिया गया हैं. आइये इसको साफ़ शब्दों में समझने के लिए इसके एक-एक बिंदु पर नजर डालते हैं.

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दिल्ली न्यूनतम वेतन का पूरा मामला

मजदूरों के लम्बे संघर्ष और मांग के बाद दिल्ली सरकार ने मार्च 2017 में न्यूनतम वेतन में 37 फीसदी की बढ़ोतरी का नोटिफिकेशन जारी किया था. जिसको कुछ मालिक संगठन के द्वारा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और दो साल सुनवाई चलने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उस नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया. जिसके बाद एक बार फिर से दिल्ली सरकार ने मजदूरों 37 फीसदी बढ़ा वेतन घटा दिया गया. जिसके बारे में 08.08.2018 को नोटिफिकेशन भी जारी किया गया था.

जिसके बाद मजदूरों ने दुबारा सरकार पर दवाब बनाया और दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट के आर्डर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हलांकि यह काम भी सरकार ने दबाव में किया. जिसके कारण तीन महीने तक कोई सुनवाई नहीं हो पाई.

जिसके बाद दिनांक 09.10.2018 को सुरजीत श्यामल आरटीआई के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के (SLP. No) केस नंबर आदि की जानकारी जाननी चाही. जिसके बाद दिल्ली सरकार का लेबर विभाग नींद से जागी और आरटीआई का गोलमटोल जवाब 16.10,2018 को दिया. मगर फायदा यह हुआ कि 22 अक्टूबर 2018 को केस पहली बार लिस्ट हुआ और 31 अक्टूबर 2018 को सुनवाई हो गई.

पहली ही सुनवाई में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मजदूरों को अंतरिम आदेश जारी करते हुए दिल्ली सरकार को पुनः 37% वृद्धि वाला नोटिफिकेशन जारी करने का आदेश देती हैं. इसके साथ ही अगले तीन महीने के अंदर दिल्ली के मजदूरों का नया न्यूनतम वेतन Re-fixed कर कोर्ट में लाने का आर्डर जारी होता हैं.

इसके तुरंत बाद यानी 01.11.2018 को दिल्ली सरकार द्वारा कम से कम 14,000 न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाता हैं. इसके साथ ही कोर्ट के आदेश को अनुपालन हेतू एक मजदुर परिवार को जिन्दा रहने हेतू रोटी, कपडा और मकान में निर्धारित खर्च का आंकलन न्यूनतम मजदूरी तय कर सभी हितधारकों से सुझाव / विचार / आदानों / टिप्पणियों को आमंत्रित करने के लिए 12.11.2018 को श्रम विभाग की वेबसाइट यानी www.labour.delhigovt.nic.in पर अपलोड किया गया है.

इसके बाद न्यूनतम वेतन अधिनियम के अनुसार त्रिपक्षीय कमेटी, जिसमें ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधि, कॉरपोरेट के प्रतिनिधि के आलावा श्रम विभाग के अधिकारीयों को लेकर न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति का गठन किया जाता हैं. दिल्ली सरकार द्वारा सर्वसम्मति से 15.02.2019 को प्रस्तावित न्यूतम वेतन 14,842, रुपया पास कर लिया जाता हैं.

माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार यह रिपोर्ट 31 जनवरी 2019 तक जमा हो जाना चाहिए था. मगर लेबर विभाग को माननीय सुप्रीम कोर्ट में जमा करने के वजाय उदासीनता दिखाते हुए, तीन महीने तक उक्त फाइल को रोक कर रखा. जिसके बाद सुरजीत श्यामल के आरटीआई के तहत ध्याकर्षण के बाद विभाग ने 26 जुलाई 2019 को दिल्ली के नया न्यूनतम वेतन की फाइल सुप्रीम कोर्ट में (RTI Reply) जमा करवाई.

इस दौरान लेबर विभाग ने 01 अप्रैल 2019 का मंहगाई भत्ते का नोटिफिकेशन नहीं जारी किया और उक्त आरटीआई के जवाब में सुप्रीम कोर्ट में केस पेंडिंग का हवाला दिया. जो कि बिलकुल निराधार ही नहीं बल्कि दिल्ली सरकार का मजदुर विरोधी कदम था.

यही नहीं, बल्कि भले ही आरटीआई के दवाब में लेबर विभाग ने सुप्रीम कोर्ट में फाइल जमा करवा दिया हो, मगर केस की सुनवाई में कुछ खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे, जिसके वजह से पिछले 6-8 महीने से केवल डेट पर डेट मिल रहा था. जिसके बाद हमने 07.10.2019 से ऑनलाइन पेटिशन अभियान चलाया और सरकार नींद से जागी और माननीय सुप्रीम कोर्ट में 14.10.2019 को सुनवाई हुई.

एक बार फिर से माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के 50 लाख मजदूरों के हक़ में फैसला देते हुए दिल्ली सरकार द्वारा प्रस्तावित 14,842 न्यूनतम वेतन को लागू करने का आदेश जारी कर दिया. इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि जब तक सरकार इसका नोटिफिकेशन नहीं जारी करती तब तक पुराना आदेश के तहत 14,000 लागू रहेगा.

इस आदेश के तहत दिल्ली सरकार ने 22.10.2019 को गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया. जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के अनुसार कम से कम 14,842 रुपया न्यूनतम वेतन निर्धारित किया और इसको दिल्ली के मजदूरों के लिए प्रकाशन के तिथि से मान्य घोषित किया गया.

इसके आलावा दिल्ली के मजदूरों का सुप्रीम कोर्ट में केस पेंडिंग रहने से अप्रैल 2019 और अक्टूबर 2019 का मंहगाई भत्ता रोका हुआ था. इसको भी नोटिफाईड करना था. इसके बारे में कल यानि सोमवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री केजरीवाल के साथ बैठे श्रम श्रममंत्री श्री गोपाल राय ने कहा भी था.

मगर हम कहते हैं कि उन दोनों ने दिल्ली के मजदूरों को ही नहीं बल्कि पुरे देश को झूठ बोला. अब आप सोच रहे होंगे कि हम ऐसा क्यों और किस आधार पर बोल रहे तो इसके लिए आपको लेबर विभाग द्वारा चुपके से जारी न्यूनतम वेतन का नोटिफिकेशन दिनांक 23.10.2019 पर गौर करना होगा.

Minimum Wages in Delhi सुप्रीम कोर्ट के आर्डर में गोलमोल तो नहीं

अगर अरविंद केजरीवाल जी का माने तो दिल्ली का न्यूनतम वेतन 14,842 और अगर लेबर विभाग को माने तो (14,000+468+338= 14806) 14,806 और वो भी अप्रैल और अक्टूबर 2019 के मंहगाई भत्ते को जोड़ने के बाद. जबकि अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट के आर्डर को एक बार दोबारा पढ़ें तो उसमें खुद दिल्ली सरकार द्वारा कम से कम  प्रस्तावित 14,842 रुपया मासिक न्यूनतम वेतन का आर्डर दिया गया हैं.

जिसके बारे में केजरीवाल जी ने भी झूठ बोला कि सुप्रीम कोर्ट ने 14,000 न्यूनतम वेतन का आर्डर दिया हैं. यह तो आर्डर को पढ़ने की बात हैं. मुख्यमंत्री जी, हम आज के पढ़े-लिखे मजदूर हैं. एक तो आपने अपने प्रस्तावित न्यूनतम वेतन में दिल्ली में कमरे का किराया 874 रुपया दिखाया हैं और आज आपने अपने इस कूटनीति से उसको भी छीन लिया. वाह जी वाह…बन गए न आम आदमी से ख़ास आदमी..अरे हुजूर, हम तो कहते हैं कि हमारे तरफ से 51/- और ले लो और हमारे परिवार को रहने के लिए घर ही दे दो. मगर हम लड़ेंगे और पहले भी झुकाया और अब भी झुकायेंगे.

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13 thoughts on “Minimum Wages in Delhi सुप्रीम कोर्ट के आर्डर में गोलमोल तो नहीं”

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