ज्यादातर सरकारी पद ठेका पर, फिर भी आरक्षण की राजनीति क्यों?

केंद्र में जब से नई सरकार आई है तब से आरक्षण के लिए  कुछ ज्यादा ही आवाज उठने लगी है. कुछ लोग इसको समाप्त करने की दलील देते नजर आ रहें है तो कुछ लोग इसको बचाने की बात कर रहें है. आये दिन शोसल मिडिया पर भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जाता रहता है. बगैर इसकी वास्तविकता जाने लोग आरक्षण के बारे में ज्ञान बांटते नजर आ ही जाते हैं. जबकि वास्तविकता इन सब बातों से कोशो दूर है. यह जरूरी नहीं की हमारी सोच 100 फीसदी सही हो. मगर शायद इसको जानने के बाद आपको भी यकीन करना ही पड़ेगा.

ज्यादातर सरकारी पद ठेका पर, फिर आरक्षण की राजनीति क्यों?

हमारी समझ से देश में आरक्षण-आरक्षण चिल्लाने वाले असल में अपनी राजनितिक रोटी सेंक रहे हैं, चाहे वो जाट आरक्षण की बात हो या गुर्जर या ब्राह्मण या कोई पिछड़ी या एससी एसटी की. एक तरह से देखे तो पुरे देश में नई केंद्र सरकार ने सत्ता में आते ही नई नियुक्ति पर रोक लगा दी. पहले जब कांग्रेस सत्ता में थी तब कांग्रेस सरकार के 40% एफडीआई का विरोध यही बीजेपी ने किया था.

मगर आज सत्ता में आते ही 100% एफडीआई लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसा करके आज पुरे देश को ठेकेदारी पर देने की कोशिश की जा रही है. जबकि आज पुरे देश में 70% से भी ज्यादा लगातार चलने वाला काम ठेका पर लिया जा रहा है.

सरकारी न्युक्ति पर पहले से ही रोक

इस ठेके की आड़ में पहले से ही आरक्षण चाहे वह एससी-एसटी आरक्षण चाहे बैक-वार्ड आरक्षण या विकलांक कोटा, खेल कोटा या अन्य कोई अन्य कोटा पहले से ही समाप्त किया जा चुका है. जब सरकारी न्युक्ति पर पहले से ही रोक लगा है तो अब किसी को भी आरक्षण मिलने का सवाल ही पैदा नही होता है.

जिस तरह से अच्छे दिन का सपना दिखाकर बीजेपी सत्ता में आई और ठीक इसके उल्टा काम कर के जनता का भरोषा ही तोड़ा बल्कि कभी लव-जिहाद, कभी गाय-गोबर, रोहित वेमुला, जेएनयू, बीफ, आरक्षण के मुद्दे उठाकर देश की जनता का अमन शांति को छीना है. सत्ता पक्ष के लोग खुद ही आरक्षण के मुद्दे को हवा देकर देश के लोगों का ध्यान मंहगाई, बेरोजगारी व शिक्षा से हटाना चाहते है. असल में वो नहीं चाहते कि कोई रोजगार की बात करे. अपने आईटी सेल व अन्य माध्यमों से देश के जनता के बीच दरार पैदा कर उनको बांटने की कोशिश में लगे रहते हैं.

हम सीधे-साधे लोग भी उनके बहकावे में आकर आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन करते हैं तो स्वार्थी और असामाजिक तत्व उस भीड़ में शामिल होकर दंगा से लेकर आमजन के साथ लूट और बलात्कार जैसे शर्मनाक घटना को अंजाम देते हैं.

सरकारी पदों पर नियुक्ति पर रोक हटाने की मांग करें

अगर मांगना ही है तो जातिप्रथा को समाप्त करने की मांग करें और देश में सरकारी पदों पर नियुक्ति पर रोक हटाने की मांग करें, समान काम का सामान वेतन देने की मांग करें. अगर आंदोलन करना ही है तो मानव का मानव द्वारा शोषण करने वाला ठेका प्रथा का विरोध करें और इसको समाप्त करने का अभियान चलायें. अगर सचमुच मांग करना है तो मुफ़्त शिक्षा के लिए आवाज उठाये. देश का तरक्की और विकास सभी वर्गों व् समुदाय का एक सूत्र में पीरों कर शिक्षित होने से ही होगा.
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2 thoughts on “ज्यादातर सरकारी पद ठेका पर, फिर भी आरक्षण की राजनीति क्यों?”

  1. युवाओ की मांग होनी चाहिए ठेका प्रथा हटाओ देश बचाओ।

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