अजित सरकार मजदूर नेता के शहादत दिवस पर जाने, उनकी अनसुनी कहानी

बिहार: पूर्णिया सदर सीट का अपना अलग ही महत्‍व है. पूर्णिया सदर सीट 1980 से 1998 तक माकपा के कब्जे में रहा और पूर्व विधायक अजित सरकार का राजनीतिक प्रभाव यहां से बना रहा. अजित सरकार एक ऐसा नाम जिसको पूर्णिया का बच्चा -बच्चा जानता है. इसका बहुत बड़ा कारण है. यूँही नही कोई अजित सरकार बन जाता है. उसके पीछे त्याग और संघर्ष का जज्बा होना चाहिए. आज उनकी पुण्यथिति है. उनके बारे में काफी कम जानकारी है. कुछ जानकारी इकट्ठी की है और फिर भी उन जानकारियों को जोड़ कर एक कहानी तैयार हो गई.

अजित सरकार की अनसुनी कहानी

जानकार बताते हैं कि अजित सरकार के पूर्वज रिफ्यूजी थे. वो बंगलादेश विभाजन के समय पूर्णिया में आकर बस गये थे. अजित सरकार का जन्म सन 1947 में पूर्णिया जिले में हुआ था. वही पर पढाई के दौरान एसएफआई के नेता से सीपीआईएम सदस्य फिर विधायक बनने तक का सफर तय किया. सन 1980 से सन 1998 (मृत्यु) तक लगातार अपने क्षेत्र से विधायक रहे. उनके चहेते जन उन्हें अजित दा के नाम से बुलाते थे. उनके बारे में बताते हैं कि वो कभी चुनाव का प्रचार नही करते थे.
जब सभी राजनीतिक पार्टियां चुनाव प्रचार में व्यस्त हो जाती तो वो आराम करते थे. जब उनके कार्यकर्ता कहते थे कि ऐसे में तो आप चुनाव हार जायेंगे, तो अजित दा कहते थे कि हमने पीछे जो जनता के लिए काम किये है वही हमारा प्रचार है. इसके अलावा अजित दा अपने क्षेत्र के हर चौक-चौराहे पर लाल रंग का गमछा (जिसको शहर के भाषा मे तौलिया) को थैलीनुमा बनाकर टांग देते थे और जनता से अपील करते थे कि जो लोग उनको (अजित दा) वोट दे रहे हैं वो केवल 1 रूपया उस गमछे में चन्दा स्वरूप दें.

इसके साथ ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को निर्देश देते थे कि ध्यान रहे कि कोई भी व्यक्ति 1 रूपया से ज्यादा न डाले. इस तरह उनको सिक्को को गिनती कर अजित दा चुनाव के रिजल्ट से पहले ही जान जाते थे कि उनको कितना वोट आ रहा है. इन्ही पैसों से चुनाव लड़ते और जीत भी दर्ज करवाते थें. उनके वारे में उनके चाहने वाले बताते हैं कि वो विधायक की सैलरी पार्टी को दान कर देते थे और उसमें से मात्र 6 हजार महीना अपने निजी खर्च के लिए पार्टी से लेते थे. उनका घर उनकी पत्नी के पैसों से चलता था जो कि स्कूल टीचर थी.

कहते है कि पूर्णिया शहर और आसपास के इलाके में बंगाली बिरादरी के वोटरों की काफी संख्या है. साथ ही कुछ गांव अजित सरकार ने बसा रखे हैं. अजित सरकार ने भूमिहीनों को बड़े पैमाने पर जमीन पर कब्जा दिलवाया था.इस सादगी से पूरे क्षेत्र के लोग अजीत दा को सम्मान की नजर से देखते थे. कुछ लोग तो उनको भगवान तक कह देते थे. वह लगातार अपने क्षेत्र में पार्टी का विस्तार कर रहे थे. मगर उसी समय एक वर्ग ऐसा था जिनको उनकी यह ख्याति चुभने लगी. शायद उनको लगा कि अगर इसको रोका न गया तो कल उनकी राजनीतिक हानि उठानी पड़ेगी. हालांकि उनकी किसी से जातीय दुश्मनी नही थी मगर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम 14 जून 1998 में उनकी साजिशपूर्ण हत्या के रूप में हुई.
ट्रेड यूनियन की सक्रियता से लेकर बिहार विधान परिषद् सदस्य रामणिका गुप्ता ने अपनी किताब “हादसा” अजित सरकार के हत्या का कारण कुछ और बताया है. उन्होंने लिखा है कि उनके छेत्र के एक नाबालिग लड़की के बलात्कार की महिला डॉक्टर द्वारा गलत रिपोर्ट पर विधान सभा में सरकार से सवाल उठाया. जिसका जबाब सरकार के तरफ से मंत्री कुमुद रंजन झा दे रहे थे. आरोपित डॉक्टर उनकी बहन थी, जिसके कारण गोलमोल जबाब दे रहे थे.
जिसके विरोध स्वरूप अजित सरकार ने सदन में चिल्लाकर कहा कि छेत्र में जाकर उस जनता को क्या जबाब दूँगा जिस जनता ने मुझे चुना है. यह कहकर आवेश में उन्होंने अपना कुर्ता फाड़ लिया और कहा कि सरकार बताये कि उस लेडी डॉक्टर पर सरकार क्या कार्रवाई करेगी और उस नाबालिग लड़की के बलात्कार की जांच के लिए कमेटी बनाएगी या नही. नही तो मैं इस सदन में नंगा हो जायूँगा. जिसके फलस्वरूप सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा और सरकार को विवश होकर जाँच कमेटी बनाना पड़ा. जिसके कुछ दिनों के बाद ही अजित सरकार की हत्या करवा दी.
उस दिन पूर्णिया के खजांची हाट थाना क्षेत्र के काली फ्लावर मिल के पास अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियार से अजित सरकार पर अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें उनकी मौत हो गई. गोलीबारी की इस घटना में उनकी पार्टी के कार्यकर्ता अशफाकुल रहमान और ड्राइवर हरेन्द्र शर्मा की मौत हो गई थी. जबकि गार्ड रमेश ओराँव बुरी तरह जख्मी हो गया. अजित सरकार के भाई कल्याण ने मुकदमा दर्ज कराया था और बाद में राज्य सरकार ने इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया था. सीबीआई ने अदालत में 61 गवाह पेश किए थे, जिनमें से 23 मुकर गए.

इस मामले की सुनवाई सीबीआई की विशेष अदालत में 8 साल तक चली और फैसला 10 साल बाद 2008 में आया. जिसमें इस हत्याकांड के आरोपी राजद के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव, पूर्व विधायक राजन तिवारी और अनिल यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. इसके बाद तीनों पर दस-दस हजार रुपए का अर्थदंड भी लगाया गया था.जिसके बाद में आरोपियों के तरफ से इस फैसले को पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दिया गयक और सन 2013 में  माकपा नेता अजीत सरकार हत्या मामले में राजद के पूर्व विवादित सांसद पप्पू यादव को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.

सन 2013 में ही सीबीआई की अपील पर सांसद पप्पू यादव को पटना हाईकोर्ट द्वारा बरी करने के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है. सीबीआई की ओर से सीनियर वकील मुकुल गुप्ता ने कहा कि पटना हाईकोर्ट ने इस हत्याकांड में अनेक मुख्य गवाहों और टेलीफोन के रेकार्ड की अनदेखी करके पप्पू यादव को बरी करके भूल की है. ऐसे भी आये दिन सीबीआई के कार्यप्रणाली पर आरोप लगते रहे है.
न्यूज 18 की खबर के अनुसार 1998 में अजित सरकार की हत्या के बाद उनकी विधवा माधवी सरकार विधायक चुनी गई और 2000 तक वह विधायक रहीं. इसके बाद चुनाव में माधवी सरकार और उनके बेटे अमित सरकार ने लगातार इस चुनाव से दावेदारी की और कभी दूसरे तो कभी तीसरे नंबर पर बने रहे. माधवी सरकार ने माकपा को छोड़कर माले के टिकट पर भी चुनाव लड़ा था. माधवी ने कहा कि माले ने पटना में अजित सरकार का स्मारक बनाकर वामपंथी इतिहास रचा था, जिससे वे माले से जुड़ गई थीं. माधवी ने माकपा प्रत्याशी को अपना नैतिक समर्थन दिया है.
इस बार चुनाव में माकपा ने हाल ही में पार्टी में आए राजीव सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है, जिसके साथ ही पूर्णिया सदर सीट से 1980 के बाद अजित सरकार और उनके परिवार की दावेदारी राजनीतिक रूप से खत्म हो गई है. अजित सरकार के सहादत के दिन ही उनकी धर्मपत्नी माधवी सरकार 14 जून को ही लम्बी बीमारी के बाद 14 जून 2016 को ही सिल्लीगुड़ी के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया.
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