एक याचिका की सुनवाई करते हुए माननीय दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि एक उद्योग जो अपने श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी नहीं देता है, को “जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है”, न्यायालय ने कहा है कि इस तरह की मजदूरी का भुगतान “गैरकानूनी और निष्पक्ष” के रूप में नहीं किया जा रहा है. मजदूरों को Minimum Wages दिए बिना उन्हें रोजगार एक आपराधिक अपराध का गठन होता है जिसके लिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत दंडात्मक प्रतिबंध प्रदान किए गए हैं.
Minimum Wages किसी भी कर्मचारी का मौलिक हक, न देना जुर्म – DHC
कोर्ट ने कहा कि “एक मजदूर को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान गैरकानूनी और गैर-कानूनी है,” इस चर्चा में कोई संदेह नहीं है कि न्यूनतम मजदूरी कामगारों की मूल पात्रता है, और एक उद्योग जो मजदूरों को उन्हें न्यूनतम वेतन दिए बिना रोजगार देता है, उन्हें जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है.
अदालत ने कहा, ‘एक कर्मचारी को न्यूनतम मजदूरी नहीं देना कानूनन अनुचित और अक्षम्य है. इस चर्चा में किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिेए कि न्यूनतम मजदूरी किसी भी कर्मचारी का मौलिक हक है और ऐसे उद्योग, जो कर्मचारियों को बिना उन्हें न्यूनतम मजदूरी दिए काम पर रखते हैं, उन्हें चालू रहने का कोई हक नहीं है.
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Surjeet Shyamal एक श्रमिक जागरूकता लेखक हैं, जो Private Employees को PF, वेतन, ग्रेच्युटी और लेबर कानून से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सरल हिंदी में प्रदान करते हैं। उनका लक्ष्य कर्मचारियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना और सही मार्गदर्शन देना है, ताकि वे सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य जीवन जी सकें। Read More