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    विश्व आदिवासी दिवस: आदिवासी लड़ रहे जमीन और वजूद बचाने की लड़ाई कल भी आज भी


    नई दिल्ली: आज दुनियाभर के कई देशों में आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है. इस वर्ष 23वां विश्व आदिवासी दिवस पूरे विश्वभर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. आज ही के दिन संयुक्त राष्ट्रसंघ ने दुनियाभर के आदिवासी समाज के मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए प्रस्ताव पारित किया था. जिसके बाद से यह दिवस दुनियाभर में यह दिवस मनाया जाता है.

    एक तरफ हम  देश के आजादी के 70 वां वर्षगांठ मनाने जा रहे है. मगर आजादी की लड़ाई में हमारे साथ कदम से कदम मिलकर लोहा लेनेवाले आदिवासी के बारे में मन में सवाल उठता है कि क्या आज भी वे आजाद हुए? इसके बारे में प्रभात खबर ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि आजाद भारत के शासकों ने आदिवासियों के साथ न्याय करने का वादा किया था, लेकिन काम ठीक इसके विपरीत हुआ. भारतीय संविधान के मूर्त रूप लेते ही आदिवासी लोग छले गये. ब्रिटिश शासन के समय आदिवासियों के लिए अंग्रेजी में ‘अबॉरिजिनल’ शब्द का प्रयोग किया जाता था, जिसका अर्थ आदिवासी है. इसलिए जब संविधान का प्रारूप तैयार हुआ तो उसमें आदिवासियों के लिए संविधान के अनुच्छेद 13(5) में ‘अबॉरिजिनल और आदिवासी शब्द’ रखा गया था. संविधान सभा में बहस के दौरान जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था कि हमें ‘आदिवासी’ शब्द के अलावा कुछ मंजूर नहीं होगा, क्योंकि यह हमारी पहचान का सवाल है. लेकिन, जातिवाद से ग्रसित नेताओं ने आदिवासियों के ऊपर जातिवाद को थोपते हुए संविधान में आदिवासियों को ‘जनजाति’ का दर्जा देकर उनके आदिवासी पहचान पर सीधा प्रहार किया.

    आजादी के समय भी आदिवासियों ने जमीन बचाने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाये थे और आज भी भारत सरकार से अपनी जमीन और वजूद बचने की लड़ाई लड़ रहे है. भारत में मोटे तौर पर तीन बड़े संघर्ष क्षेत्र हैं. एक तो जम्मू कश्मीर है. दूसरा क्षेत्र मध्य भारत का आदिवासी इलाक़ा है जो झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ से सटा है. तीसरा इलाक़ा, उत्तर पूर्व भारतीय जनजातीय समुदाय का इलाक़ा है. इसमें दूसरा संघर्ष क्षेत्र परंपरागत आदिवासी इलाक़े के संसाधनों के इस्तेमाल से जुड़ा है. जहां प्रचुर मात्रा में खनिज और कोयला मिलता है और भारत सरकार इन संसाधनों का दोहन राष्ट्रीय संपत्ति के नाम पर करना चाहती है. लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जिन आदिवासियों की ज़मीन सरकार ले रही है, उनके साथ निष्पक्षता से बर्ताव नहीं करती. कुछ हद तक कहा जा सकता है ये जानबूझकर नहीं किया जाता. उनको जमीन से हटाने के लिए पुलिस और सेना के द्वारा प्रताड़ित किया जाता है. एक तरह से कहें तो देश के आजादी के बाद भी इनको छला गया है.
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