IRCTC- जहां बाथरूम जाने पर पाबंदी, संघर्ष के दम पर वर्करों ने हक़ के अरबों रूपये

IRCTC – आये दिन कुछ साथियों का सवाल होता है कि हमारी लड़ाई में कुछ पॉजिटिव दिखे तो उत्साह बढ़ जाये लड़ने का. मगर जिस तरह मृग पूरे जंगल मे कस्तूरी के लिए भटकता है. जबकि कस्तूरी उसके नाभि में ही होता है. ठीक उसी प्रकार कदम-कदम पर आईआरसीटी के मगरूर अधिकारियों के काले और गैरकानूनी कारनामों का फर्दाफास्त भी किया और उनको हराया भी है. मगर फिर भी लोग मृग की तरह उस जीत को देख नही पा रहे हैं. आइये एक बार पीछे चलते हैं और अपने-अपने दिमाग पर जोड़ डालते हैं. फिर आप पायेंगे कि अरे हाँ यह तो हमने सोचा ही नही था.

IRCTC- जहां बाथरूम जाने पर पाबंदी

सबसे पहले आईटी सेंटर के वर्करों ने पीएफ के रूप में आईआरसीटीसी को एम्प्लायर कंट्रीब्यूशन देने को बाध्य किया था. जो कि हमारी पहली जीत थी. जिसे लगभग हमारी सैलरी 1200-1500 के आसपास प्रति माह कि सैलरी में वृद्धि हुई थी.

आईआरसीटी ने अप्रैल 2014 में कस्टमर केयर का टेंडर निकाल कर वर्करों को नौकरी से निकालने की साजिश की थी. जिसको हमने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देकर रोकने पर मजबूर किया, मगर 125 वर्करों ने मैनेजमेंट की चाल में आकर लिखकर दिया कि वो लोग हमारे यूनियन के साथ नही हैं. उसके बाद ही प्रबन्धकों ने वर्करों को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

आपमें किसी ने सोचा कि हमारी यूनियन ने आईआरसीटीसी जैसी बड़ी कम्पनी को पीछे हटने पर मजबूर कर टेंडर रोक कर 1 साल में एक वर्कर की 15 हजार रुपये सैलरी के हिसाब से 155 वर्करों को 27 करोड़ 90 लाख रुपये लगभग सैलरी के रूप में लिया. यह हमारी जीत हुई की नही?

यही नही बल्कि मैनेजमेंट के आधिकारी खुलेआम वर्करों को कहते फिरते थे कि सुरजीत श्यामल के केस की वजह से इंक्रीमेंट  रुका है. अब तो यह कोर्ट से ही मिलेगा. इसके अलावा प्रबन्धकों ने धूर्तता से न्यूनतम वेतन बढ़ने पर other allowance को basic में मर्ज कर जालसाजी की थी. जिसकी शिकायत हमारी यूनियन ने पीएफ ऑफिस तक उठाया.

आईटी सेंटर से लेकर कॉर्पोरेट ऑफिस, कलकत्ता से लेकर मुंबई तक के वर्करों ने भी कम विरोध नही किया. जिसके बाद हमारी एकता कि जीत हुई और आईआरसीटीसी ने झुकते हुए 18000+12000 मतलब एक वर्कर को 30,000 और टोटल जोड़े तो 10 करोड़ 50 लाख रुपये देने पड़ा.

इसके बाद भी इंस्पेक्शन के समय गार्ड और सफाईकर्मियों को न्यूनतम वेतन और सप्ताहिक अवकाश न देने की बात खुद सुरजीत श्यामल ने लेबर इंस्पेक्टर राजीव कुमार के सज्ञान में दिया.

जिसके बाद कर्मचारियों से पूछ-ताछ में इसकी पुष्टि हुई. फलस्वरूप श्रम मंत्रालय के दबाब के आगे फिर से वर्करों की जीत हुई और मिनिमजम वेतन 9500 रुपया और सभी छुट्टियां सप्ताहिक छुट्टी समेत मिलने लगा. जबकि पहले मात्र 7000 रुपया देते थे.

इसके बाद विशाखा गाईड लाईन के तहत इंटर्नल कम्प्लेन कमेटी का गठन हमारी यूनियन वह बहादुर महिला कमर्चारियों की जीत है. पिछले कई वर्षों से इस कानून का भी खुला उलंघन हो रहा था.

इस तरह से जोड़कर देंखे तो चंद मुट्ठी भर वर्करों ने अपनी एकता और संघर्ष के दम पर आईआरसीटीसी से अपने और अपने साथी वर्करों के हक का अरबों रुपया ले चुके जो कि अभी नाममात्र ही है.अब अगर सभी वर्कर एक साथ आ जाये तो आपको पता भी है क्या होगा? जी हाँ अपने आप अपने 13 साल के शोषण का हिसाब चंद दिनों में ले सकते है. जिसका एकमात्र विकल्प एकता और संघर्ष ही है.

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