• Breaking News

    रेल गरीब जनता की दिलों की धड़कन, फिर निगमीकरण क्यों

    रेल गरीब जनता की दिलों की धड़कन, फिर निगमीकरण क्यों

    लेल गाड़ी, लेल गाड़ी (रेल-गाड़ी ) बचपन मैं तुतली जुबान से बोलने से लेकर आज़ बेच रेल-गाड़ी तक हमेशा कौतूहल का विषय बना हुआ रहता हैं. अब आगे क्या होगा ?? हो भी क्यों नही रेलवे गरीब जनता की दिलों की धड़कन जो है.
     

    जब रेल चलती हैं तो पूरा देश चलता है. रेल रुकती हैं तो देश ठहर सा जाता है. इतिहास गवाह इसलिये तो अभी तक रेलवे में एक ही बार हड़ताल हुई है. उसके बाद कभी नही हुई मगर अब लगता है कि फ़िर से दुबारा वह समय आ गय़ा है. निगमीकरण ने उसी मोड़ की औऱ इंगित कर दिया है.

    जब से सरकार के रेल मंत्री ने निगमीकरण पर अपना पक्ष सदन में रखा है. विरोध के स्वर तेज़ हो गये हैं. चारों तरफ़ उत्पादन इकाइयों से लेकर जन आंदोलन बन चुका हैं. रोज़ धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं.

    देश के लाखों कर्मचारी टकटकी लगा कर माननीय प्रधामंत्री की ओर देख रहे हैं. जब उन्होंने भरी सभा में कहा था कि मैं बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करता था. हमसे ज्यादा रेलवे से कोई प्यार नही करता. हम रेलवे का निगमीकरण कभी नही करेगें.

    मगर आज आपके रेल मंत्री हमारे अभिभावक श्री पीयूष गोयल खुले आम कह रहे हैं कि हमने निगमीकरण के लिये 100 दिन का एक्शन प्लान भी तय कर दिया है. क्या उन हजारों कर्मचारी के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा हैं. जो ऊँची-ऊँची सपने लेकर रेलवे में आये थे औऱ हमारी युवा पीढ़ी भी रेलवे में रोज़गार पाने के अवसर देख रहे हैं, क्योंकि भारतीय रेल ही देश में सबसे ज्यादा रोज़गार देती हैं.

    क्या निगमीकरण के नाम पर उनके सपनों को कुचले का काम नही किया जा रहा? हम सब जानते हैं कि बीएसएनएल के कर्मचारी के साथ क्या हुआ? बीएसएलएल हजारों करोड़ के साथ लाभ कमा रही थी मगर उनके कर्मचारी को लगभग 10-12 साल के बाद तनख्वाह देने के लिये पैसे नही बचे? यह सब निगमीकरण के कारण हुआ. पूंजीवादियों को लाभ पहुँचाने के कारण देश  की उत्पादन इकाइयों को बेचा जा रहा हैं.

    रेल, भेल, सेल, गेल आदि कतार में खड़ी हैं. मजदूरों के साथ अन्याय हो रहा है. इसे देख कर लग रहा है कि भारत आगे की ओर नही पीछे की ओर जा रही है. रेल, पहिए की तरह आगे -पीछे दोनों तरफ़ चलती है. जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के उद्देश्य से भारत में क़दम रखा था. उसके बाद गुलाम बना दिया और अब शायद यही होने वाला है. मज़दूर पूंजीवादियों के गुलाम हो जायेंगे. उनकी मनमानी चलने लगेगी. 

    अभी-अभी का ताजा एक उदहारण है कि हबिबगंज रेलवे स्टेशन का जहाँ पर गाड़ी पार्किग के 5 घंटे के 100 ₹ लिया जा रहा हैं. उसके बाद भी हर घंटे का शुक्ल बढ़ते रहता है. ये स्टेशन पूंजीपति को दे दिया गया है. जो मनमाने तरीके से पैसे ले रहे हैं औऱ तो औऱ वेटिंग रूम का चार्ज भी अलग-अलग स्टेशन पर घंटे के हिसाब से ले रहे हैं. आगे आने वाला दिनों में तो ये भी हो सकता है कि कम्पनी वाले संडे एक अलग चार्ज और ऊपर बर्थ का अलग नीचे का अलग. बेचारी गरीब जनता मज़दूर पिस्स जायेंगे. उनका रोजी-रोज़गार से लेकर सबकुछ बंद हो जायेगा.
     

    भारतीय रेल ने सबका ख़याल रखा, सब्जी वाले से लेकर छात्र तक गरीब से अमीर तक. अपने दम पर दिन दूना-रात चौगुनी तरक्की की हर वर्ग का ख़याल रखा हैं. आज़ इस तरक्की की किसकी नज़र लग गई हैं जो निगमीकरण करने को चला हैं.

    हम वर्ष 2018-19 में 500 रेल इंजन के बदले 734 रेल इंजन तथा 4200 सवारी डिब्बो की कुल छमता मैं 6076 सवारी डिब्बों का निमार्ण कर चूके हैं. अब बात मॉडर्न कोच फैक्ट्री रायबरेली की लें. यहाँ पर लगभग 2200 कर्मचारी हैं. 1000 कोच बनाने की छमता हैं. 2018-19 मैं 1425  LHB कोच बनाये गयें है. जबकी सबसे अत्याधुनिक तकनीकी से लेस फैक्ट्री है. यहाँ तो स्मार्ट कोच भी बनाये जा रहे है. बुलेट ट्रेन भविष्य में बनाने की योजना है. खुद रेल मंत्री सदन में कह चुके है.

    फिर लाभ में चलने वाली फैक्ट्री का निगमीकरण क्यों? किसी खास वर्ग को लाभ में पहुँचाने की मंशा तो नही ?

    महाभारत में कहा गया हैं. 

    "जब नाश मनुज पर छाता है,पहले विवेक मर जाता है".

    आज रेल के लाखों कर्मचारियों के सीने में इस निगमीकरण के खिलाफ़ आग धधक रही है. लोग चिंतित हो रहे यह धीरे-धीरे कैंसर का रूप धर कर रेल को ख़त्म करने की कगार पर है, लेकिन हम आम लोगों की धड़कन को बचाने के लिये लड़ेंगे जब तक निगमीकरण ख़त्म नही हो जाता यहां रोज़ प्रदर्शन जारी रहेगा.

    हम तो अपना हक़ माँग रहे हैं. अगर नही मानी जायेगी तो जनांदोलन होगा. क्योंकि जिसने कभी कोई ईंट न लगाई हो. आज़ वो पूरा मकान बेचने को चले है. हमें सड़को पर ला कर खड़े कर दिया है. हम सड़क पर उतरेंगे. अपनी आजादी के लिये गुलामी से बचने के लिये. संसार ने देख है कि मजदूरों का हक़ आसानी से नही मिलती उसे छीनना पड़ता है. अब चाहे काम के घंटे हो या कुछ औऱ. निगमीकरण के खिलाफ़ मजदूरों एक हो.

    लेखक: रोहित रंजन, रेल कर्मचारी

    No comments:

    Post a Comment

    अपना कमेंट लिखें

    loading...